कोहरे की चादर से ढंका आसमान
जौनपुर। कोहरे की चादर से आसमान के ढंकने का क्रम गुरुवार से शुरू हो गया जो शुक्रवार को जारी रहा और इसी के साथ गरीबों की परेशानी भी बढऩे लगी है। एक दिन पहले धुले गए कपड़े दूसरे दिन भी नहीं सूख सके। हल्के कपड़े जो आसमान के नीचे पड़े रह गए वह भी नम हो गए। ऐसा लगा कि सूखे कपड़े पर रात में बारिश हो गई हो।1घने कोहरे के साथ सुबह शीतलहर भी शुरू हो गई। नतीजा जीवन की रफ्तार धीमी मंद दिखी। दोपहर बाद आसमान भगवान भास्कर ने झांका लेकिन तीखी धूप के लिए लोग तरसते ही रह गए।
बुधवार की रात से शुरू कोहरे की स्थिति यह है कि भोर में और रात में रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। दिन में भी शहर के बाहर घना कोहरा होने से वाहनों की हेड लाइट जलानी पड़ी। स्थिति यह रही कि पूरा शरीर गर्म कपड़ों से ढंकने के बाद भी कंपकंपी छूट रही थी। हर तरफ लोगों के मुख से यही निकल रहा था कि अबकी भगवान ने काफी पहले कहर बरपाना शुरू कर दिया है। सरकारी अलाव का कहीं पता नहीं है लेकिन घरों में सुबह और शाम अलाव जलना मजबूरी बन गई है। मौसम की मार का आलम यह है कि लकड़ी के टाल अभी से सज गए हैं। हर कोई राहत की तलाश करता नजर आ रहा है। बूढ़े और बीमारों के अलावा जिन्हें कभी हड्डी में चोट लगी है उनकी हालत ज्यादा पतली है। बुजुर्गो की हालत तो यह हो गई है कि अलाव के बिना रहना मुश्किल हो गया है।
सुबह के वक्त अखबार और दूध बेचने वालों की हालत तो देखकर ही शरीर कांप गया। सबकी दिनचर्या बदली दिखी। वाहनों की गति कम होने से यात्र पूरी होने में ज्यादा समय लग रहा है। घने कोहरे के कारण शहर से बाहर निकलना दिन में भी मुश्किल हो जा रहा है। राहत के लिए गरीब सरकारी अलाव पर ही आश्रित हैं क्योंकि उनकी गरीबी उन्हें घर में अलाव जलाने की इजाजत नहीं दे रही है। जिनके पास साधन का अभाव है, वे दिन-रात ठिठुरकर व्यतीत कर रहे हैं। सुबह के साफ किए गए कपड़े दूसरे दिन तक नहीं सूख पाने से गरीबों की समस्या और भी बढ़ गयी है। ऊनी वस्त्रों के सूखने में तो कई दिन लग जा रहे हैं। जिनके पास कपड़ों का अभाव है, वे कोहरे को देख कपड़े भी साफ करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। कुल मिलाकर कोहरा और सर्द हवाओं ने हर किसी के लिए मुसीबत खड़ी कर दिया है।
बुधवार की रात से शुरू कोहरे की स्थिति यह है कि भोर में और रात में रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। दिन में भी शहर के बाहर घना कोहरा होने से वाहनों की हेड लाइट जलानी पड़ी। स्थिति यह रही कि पूरा शरीर गर्म कपड़ों से ढंकने के बाद भी कंपकंपी छूट रही थी। हर तरफ लोगों के मुख से यही निकल रहा था कि अबकी भगवान ने काफी पहले कहर बरपाना शुरू कर दिया है। सरकारी अलाव का कहीं पता नहीं है लेकिन घरों में सुबह और शाम अलाव जलना मजबूरी बन गई है। मौसम की मार का आलम यह है कि लकड़ी के टाल अभी से सज गए हैं। हर कोई राहत की तलाश करता नजर आ रहा है। बूढ़े और बीमारों के अलावा जिन्हें कभी हड्डी में चोट लगी है उनकी हालत ज्यादा पतली है। बुजुर्गो की हालत तो यह हो गई है कि अलाव के बिना रहना मुश्किल हो गया है।
सुबह के वक्त अखबार और दूध बेचने वालों की हालत तो देखकर ही शरीर कांप गया। सबकी दिनचर्या बदली दिखी। वाहनों की गति कम होने से यात्र पूरी होने में ज्यादा समय लग रहा है। घने कोहरे के कारण शहर से बाहर निकलना दिन में भी मुश्किल हो जा रहा है। राहत के लिए गरीब सरकारी अलाव पर ही आश्रित हैं क्योंकि उनकी गरीबी उन्हें घर में अलाव जलाने की इजाजत नहीं दे रही है। जिनके पास साधन का अभाव है, वे दिन-रात ठिठुरकर व्यतीत कर रहे हैं। सुबह के साफ किए गए कपड़े दूसरे दिन तक नहीं सूख पाने से गरीबों की समस्या और भी बढ़ गयी है। ऊनी वस्त्रों के सूखने में तो कई दिन लग जा रहे हैं। जिनके पास कपड़ों का अभाव है, वे कोहरे को देख कपड़े भी साफ करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। कुल मिलाकर कोहरा और सर्द हवाओं ने हर किसी के लिए मुसीबत खड़ी कर दिया है।
एक अख़बार जिसमे सिमटा सारा संसा
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